वर्ना ज़माना तो कहे के -तू आमिर(शाह) है
इसीलिए जहा ज़माना मस्त है तेरी दिलदारी में
तेरा आशिक़ ही बेजान सुनसान सा है
" जब पहल- पहल देखा उसको
हसीन गुलाब सी थी वो ,
फलक ( आसमान) पे मुस्कुराता हुआ
महताब ( चाँद ) सी थी वो
लोग कहते रहे मुझको
इतनी कमाल कहाँ है वो *मन* ?
*मन* ये कहता रहा के
शब्दकोष भी कम है जो उसे परिभाषित करे
तू क्या जाने के
सारी कायनात की जद्दोजहद में बस है वो
कैसे कहूँ , पर क्यों ना कहूँ
के सारी कायनात है वो
जब पहल- पहल देखा उसको
तो हसीन गुलाब सी थी वो ,
फलक (आसमान) पे मुस्कुराता हुआ
महताब ( चाँद ) सी थी वो "
" तुम मेरे साथ थीं , तो मै भी कुछ था
अब तुम साथ नहीं , तो मै भी कहाँ कुछ रहा
तुम वापिस आ जाओ ना
जीवन-सूरज बस अब बुझने को है
तेरी चांदनी मिल जाये तो
शायद चमक सकूँ मैं भी फिरसे
कुछ पल के लिए ही सही ,
सूरज सा नहीं , तो बस जुगनू सा ही सही
रौशनी को ,जीवन को , मैं महसूस तो करुँ
चलते-चलते ही सही , ढलते-ढलते ही सही
तुम मेरे साथ थीं , तो मै भी कुछ था
अब तुम साथ नहीं , तो मै भी कहाँ कुछ रहा "