Sunday, March 15, 2020

तुमने ‘इकरार’ लिखा था कभी



तुमने ‘इकरार’ लिखा था कभी
मेरी किताब में
समझा ना था मैं कुछ भी
नादान ही रहा
आज समझा...रोया
तो फिर उससे क्या हुआ
वक़्त गया तो गया जो कभी
मेरे अंजुमन में था

तुमने ‘इकरार’ लिखा था कभी
मेरी किताब में
समझा ना था मैं कुछ भी..
नादान ही रहा 
#मन

किसको याद है..दीवाली का

किसको याद है..दीवाली का
राम के वनवास से लौट आने से कोई नाता है

अब तो बस चायनीज़ लाइटे
ज़बर मेवे ठूँसी मिठाइयाँ
रोड पे रेंगता-खीजता ट्रैफ़िक
गैस चेम्बर में साँस लेते अधमुर्दे लोग
कानफोड़ू पठाखो का शोर
ऑनलाइन कम्पनियों की झूठी सेल
रिश्वत लेने-देने का बेशर्म मेल
ही दीवाली समझ में आता है।

किसको याद है दीपावली का
राम के वनवास से लौट आने से कोई नाता है

#मन 🌙🌹

खुदा करे इन हसीं आँखो के चराग और रोशन हों


खुदा करे 
इन हसीं आँखो के चराग और रोशन हों 
और 
इन कमल होंठों की हँसी और भी विस्तृत 

ये त्यौहार आते रहें लौट-लौट 
ताकि तुझसे खुशियां पायें
और तेरे जीवन का उपवन 
खिले ,महके ,चहके और फले

खुदा करे 
इन हसीं आँखो के चराग और रोशन हों 
और 
इन कमल होंठों की हँसी और भी विस्तृत।




आप .. कितनी ख़ास हैं

आप यक़ीनन जानती हैं 
के आप .. 
कितनी ख़ास हैं
मगर ..आप कहाँ मानती हैं के 
आप कितनी ख़ास है 

मैं तो बोहोत आम हूँ ...
आपकी छुअन से 
ख़ास हुआ जाता हूँ
आप पारस हैं ..
कहाँ मानती हैं की 
आप इतनी ख़ास हैं।

एक संविधान प्यार का

एक संविधान प्यार का
चल आज से लागू कर लें
मैं जब भी याद करूँ तुझको
तू मुझे दूरभाष(phone) करे
मैं जब भी उदास हो जाऊँ
तू मुझसे मिलने आ जायें
और जब मैं ख़ुश हूँ बोहोत
तो मैं तुझ से मिल पाऊँ
एक संविधान प्यार का
चल आज से लागू कर लें
मैं जब भी याद करूँ तुझको...

-मन 🌙🌹

कश्मकश

अब बस यही कश्मकश
मेरी जान लिए जाती है
तुमको गुलाब दूँ के ना दूँ
के तुम ख़ुद गुलाब हो
शर्मिंदा गुलाब होगा
निहार तेरे शबाब को
और गुलाबी हो जाएगा
शर्म से ..ईर्षा से .. बेचारगी से।

ना ज़िद्दी हूँ

ना ज़िद्दी हूँ
ना ही ईगो रखता हूँ
ज़्यादा क्या कहूँ
दोस्तों में जीता हूँ ,
दोस्ती में मरता हूँ

दुखता है जब सही होकर भी
ग़लत ठहराया जाता हूँ
तब दुश्मनों पर नहीं
रीढ़विहीन दोस्तों पर ग़ुस्सा करता हूँ

कभी तो आँख में आँख डाल
बराबरी से बात कर दोस्त मेरे
आदेश ना लेना है ना देना है
बस दिल की सुनना है..दिल से कहना है

वो जो आदेश दे रहा 
वो दोस्त कहाँ मानता होगा
कभी सुना है की 
राजा का ग़ुलाम से कोई
बराबरी का वास्ता होगा

ना ज़िद्दी हूँ
ना ही ईगो रखता हूँ
ज़्यादा क्या कहूँ
दोस्तों में जीता हूँ ,
दोस्ती में मरता हूँ।