Sunday, May 17, 2020

मनु का जन्मदिन और चाची का स्नेह-पंखा :)

वो मनु का 40वां जन्मदिन था


मनु कोई ख़ास उत्साहित तो नहीं था
(अब सच में कितने लोग होते है जिनको 40 की उम्र में सही में,
सच में जन्मदिन का उत्साह होता है)
पर जीवन में ये संख्याये जैसे 30 ,40 ,50 किसी माइलस्टोन किसी पड़ाव का सा अहसास कराती हैं
( हालाँकि उम्र की बात करे तो अक्सर ये माइलस्टोन डराते ही ज्यादा हैं )
मनु अपने इस जन्मदिन को यादगार बनाना चाहता था
अपने ख़ास दोस्तों के साथ ये दिन बिताने का मन था उसका
एक अद्बुध विचार उसके मन में आया
तो मनु ने सरप्राइज रखा -
जन्मदिन पे दोस्तों को अपने घर सुबह 8 बजे बुलाया
पर कहाँ जा रहे हैं ,बताया नहीं
इतना बोला- "पूरे दिन का कार्यक्रम है तो बाकी मुझपे छोड़ दो"
सब टाइम पे आ गए थे
सब दोस्त मन ही मन अनुमान लगा रहे थे-
"शानदार पार्टी होगी
शायद कोई रिसोर्ट,
या फिर कोई फार्म या फिर कोई होटल या ,,,,,,,
पता नहीं क्या क्या....अरे चलो यार पार्टी तो पक्की हुयी "


7 दोस्त ,इन्नोवा कार ,ताज एक्सप्रेसवे, दिल्ली से 105 किलोमीटर दूर
और केवल 90 मिनिट में मनु का अपना गांव जहांगीरपुर आ गया
कार रुकी गांव के बाहर बने चामुंडा मंदिर पे



( माँ चामुंडा मनु के परिवार की कुल देवी हैं ,
चामुंडा मंदिर मनु के पूर्वजो का बनाया करीब 150 साल पुराना मंदिर है,
जो समय के साथ जैसे-जैसे मनु के दादाजी की जमींदारी गयी 
तो ये मंदिर भी जीर्ण होता चला गया
पर अभी कोई २० साल पहले मनु के पापा राजेंद्र गुप्ता जी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया 
और आज राजेंद्र जी की मृत्युपरांत 
उनकी समाधी "राजेंद्र पार्क" भी चामुंडा मंदिर प्रांगण में ही स्थापित है )

मनु के लिए तो हमेशा ही गांव आना,चामुंडा मंदिर आना ऐसा होता था
जैसे पापा वहीँ रहते हैं और वो मिलने आया है

इधर मंदिर पहुंचते ही दोस्तों के सपने बिखरने लगे थे :)
वो बेचारे तो किसी फैंसी मॉल या रिसोर्ट का सपना देखते हुए आये थे और पहुंचे गांव के एक साधारण से मंदिर पे
उनकी निराशा-हताशा छुपाये नहीं छुप रही थी :)
सब दोस्त ठहरे निरे शहरी
किसी का भी अपने खुद के या किसी भी गांव से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था
ज्यादा किया तो साल दो साल में चले गए प्रतापगढ़ फार्म और सोचने लगे के यही गांव का जीवन है
अब यहाँ जुलाई की भरी गर्मी में वो सब सचमुच के एक छोटे से गांव में थे
फंस गए थे बेचारे
बेमन से कार से उतरे
आपस में खुसर-पुसर चल रही थी
उन्होंने बेमन से मंदिर देखा, फोटो खिचाई
चाय-नाश्ता किया,
तो कुछ जान में जान आयी
पर भयंकर गर्मी थी
मनु भांप गया की शहरी बच्चे परेशान हैं
मनु के चचेरे भाई मनोज ने बोला-"भाई आम के बाग़ में चलते हैं "
(ये मनु के चचरे भाई का नाम भी मनोज है,छोटा मनोज। अब ये दोनों चचेरे भाइयो का नाम एक सा मनोज ही क्यों है,इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है, तो वो कहानी फिर कभी :) )



तो कार फिर हुयी स्टार्ट और कच्चे रास्ते से गांव के काफी अंदर, पहुंच गए आम के बाग़ में
( ये बाग़ गांव के एक बड़े किसान का था जो मनु के चाचाजी के मित्र थे  )
उनका वहां खूब स्वागत हुआ
पूरा बाग़ उनके हवाले कर दिया गया
( आमतौर पे ही गांव के लोग बड़े विशाल ह्रदय होते हैं और खासकर किसी दोस्त के मेहमानो को तो वो ऐसे ट्रीट करते हैं जैसे कोई देवता पधारे हो :) )
वो करीब 50 एकड़ भूभाग में फैला आम का विशाल बाग़ था
आमों से पेड़ लदे हुए थे, भार से झुके जा रहे थे
ये शहरी बच्चे तो वहां पहुंचकर जैसे पागल ही हो गए
(अरे कंफ्यूज ना होना थे ये सातों 40 -41 उम्र के ही हैं  ,
बच्चा इसलिए कह रहा हूँ क्युकी उस दिन वो सब बर्ताव 10 -12 साल के बच्चो सा कर रहे थे :)
कोई आम के पेड़ पे चढ़ा
किसी ने कटरीना कैफ के माज़ा वाले विज्ञापन को RECREATE किया
किसी ने आम तोड़े ज्यादा ,खाये कम
कोई इधर दौड़े ,कोई उधर
बाग़ में काम कर रहे किसान इस 7 बच्चो को देख देख खूब हॅसे
करीब दो घंटे की इस भाग-दौड़ और आम खाने की प्रकिर्या में सब
थकान और पसीने में तरबतर पर बेतहाशा खुश थे
मनु ने तो कभी इन सब दोस्तों को इतना खुश नहीं देखा था :)

अब इसके बाद छोटे मनोज के दिमाग का अगला आईडिया भी तैयार था
वो मनु और सारे दोस्तों को ले गया मंगला जी के फार्म-हाउस पे ,
जहाँ ट्यूबवेल लगा था


(ये मंगला जी गांव के सम्मानीय चेयरमैन हैं और मनु के चाचाजी के घनिष्ट मित्र हैं )
अब तो जो वो सारे कूदे है ,ट्यूबवेल के हौद में
जुलाई के गर्मी और ट्यूबवेल का जबरदस्त ठंडा पानी
और अगले 2 घंटे जो नहाना,कूद-फांद, हँसी-मज़ाक, बियर, कोल्ड ड्रिंक
उस पलों में वहां केवल बचपन था, दोस्त थे, मस्ती थी और प्यार भरी चुहलबाज़ी
गर्मी, पेट में आम ही आम, नहाने से हुयी जबरदस्त थकान,
और कुछ बियर की मदहोशी भी
और ना जाने बचपन के कौन-कौन से दबे हुए इमोशन थे  ,जो साकार दर्शित हो रहे थे

इधर चाचा जी का घर से बार-बार फोन आ रहा था-
"अरे भाई खाना ठंडा हो रहा है
आके पहले खाना खा लो"
सब बड़ी मुश्किल से पानी से निकले
(मनु के चाचा-चाची गांव में ही रहते है,उन के २ बेटे मनोज और विकास हैं
दोनों परिवार की खेती भी संभालते हैं और वहीँ गांव में ही रेडीमेड कपडो की दूकान भी चलाते है  )
सातों बच्चे चाचा जी के घर पहुंचते ही खाट पे, कुर्सी पे, बेड पे
मतलब जिसको जहाँ जगह मिली वो वही लंबलेट हो गया
खाना तो कब से तैयार था और अब ये सब बढ़िया से भूखे भी थे
तो बस सब टूट पड़े थे खाने पे
उस समय मनु के गांव वाले घर पे AC नहीं था ,
पंखे-कूलर थे ,पर गर्मी तो फिर भी बहुत थी
तो सब खाना खा रहे थे और
चाची हाथ का पंखा लेकर सबको हवा कर रहीं थी
उनका ये प्यार भरा व्यवहार और आग्रह करके एक-एक चीज़ खिलाना सब का दिल छू गया
मेहमान सुविधाओं का नहीं मेजबान के प्यार का भूखा होता है
(सब दोस्त आज भी चाची का वो ममतामय अवतार याद कर भावुक हो जाए हैं )
खाने के बाद चला "खुरचन" का ठंडा जादू
और उसके साथ गुलाब जामुन का गर्म तहलका
जो ख़ास खुर्जा से मनवाया था चाचा जी ने
खुरचन ,खुर्जा शहर की एक स्पेशल मिठाई है जो बहुत मीठी और ठंडी होती है,

(खुर्जा शहर मनु के गांव के पास का एक शहर है जो अपने बॉन-चाइना के बर्तनों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है )

खाना खाके कोई सो गया
कोई लेट गया
तो कोई चाचा-चाची से गांव के बारे में बाते कर रहा था

मनु उन सबको बतियाते देखता रहा
मनु के लिए ये जन्मदिन बहुत ख़ास हो गया था
जिसमे बचपन था,,
दोस्त थे,
पापा थे, (शारीरिक तरीके से चाहे ना हों पर हमेशा पास ही होते हैं :)

चाची का वो स्नेह-पंखा था
आम,खुरचन,गुलाब जामुन का मीठापन था
तो बियर का खारापन भी
और ट्यूबवेल के पानी का सौंधापन भी
(जीवन भी ऐसा ही है ना ,तरह-तरह के रंग-स्वाद लेकर आता रहता है )

शाम हो रही थी
सबको फिर उसी दुनिया में वापिस जाना था
आना तो था ही तो मनु सबको वापिस ले आया था
जहाँ जहरीला पोलुशन है , जानलेवा ट्रैफिक है
रोज़ की ट्रेडमिल भागदौड़ थी
(मैं इसे ट्रेडमिल भागदौड़ इसलिए कहता हूँ क्युकी जैसे ट्रेडमिल पे हम दौड़ते तो है पर वही उसी जगह पर ही रहते है कहीं आगे नहीं जा पाते,उसी तरह का ये RAT-RACE जीवन है ,दौड़े,और दौड़े और अचानक ख़त्म,सब ख़त्म :) )
यहाँ गाम्भीर्य हमारा बचपन छीन लेता है, जवानी में ही बूढ़ा बना देता है."

मनु के दोस्त आज भी बात करते हैं की वो
"अपना कुछ वहीँ आम के बाग़ में, ट्यूबवेल के ठन्डे पानी में, खुरचन की मिठास में या फिर चाची के स्नेह-पंखे में बाँध रख आये थे "

उस जन्मदिन को अब 7 साल होने वाले हैं
मनु तो हर महीने दो महीने में अपने गांव अब भी जाता है ,अपने पापा से मिलने
पर दोस्त ..... एक साथ फिर कभी नहीं चल पायें

मनु दोस्तों से आज भी कहता है -
"चलो हम एक और दिन के लिए बच्चे बने रह सकते हैं
कभी महीने दो महीने में ही सही एक दिन के लिए तो गांव का सादा जीवन भी जी सकते है
रुक कर ताज़ी सांस ले सकते हैं
ये शहर जोंक की तरह होते है ,जब तक शरीर का सारा खून ख़त्म नहीं होता
ये छोड़ता ही नहीं

बस एक ही रास्ता है

"जहाँ जहाँ ये चिपका हो थोड़ा सा शरीर का हिस्सा काट के इससे आज़ाद हो जाओ "

पर हिम्मत चाहिए
बहुत हिम्मत :)

#बचपन #bachpan   manojgupta0707.blogspot.com










Thursday, May 14, 2020

मिलावट

मिलावट
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हर मिलावट बुरी हो, ये जरूरी तो नहीं
मय में कभी पय (पानी) को मिलाकर देखो

हर सजावट शुभ हो, ये जरूरी तो नहीं
किसी मय्यत पे कभी तुम जा कर देखो

हर बनावट देख मन नापाक हो,ये भी जरूरी तो नहीं
माँ के आँचल में कभी सर को तुम छुपा कर तो देखो

हर मिलावट बुरी हो, ये जरूरी तो नहीं
मय में कभी पय (पानी) को मिलाकर देखो।

#मन
manojgupta0707.blogspot.com













हर गिरावट कुछ ले जाए ये जरूरी तो नहीं
सर्द मौसम का लुत्फ़ उठा कर तो देखो


हर खिलावट सुन्दर हो,जरूरी तो नहीं
काँटों से दिल कभी लगाके देखो


संजू

आपको पहले ही बता दूँ की ये कहानी अभिनेता संजय दत्त के बारे में बिलकुल भी नहीं है :)
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किसी ज़माने में दो दोस्त होते थे संजू और मनु
दोनों त्रिनगर में ही रहते थे ,पर अलग-अलग मोहल्लों में
पर एक ही स्कूल में एक ही क्लास में पढ़ते थे
उनकी दोस्ती शायद छठी क्लास में हुयी होगी
जब वो दोनों पांचवी क्लास पास करके स्कूल की छोटी ब्रांच से निकलकर
छठी क्लास में MSV स्कूल की बड़ी बिल्डिंग में शिफ्ट हुए थे

जहाँ मनु काफी चुप रहने वाला और शांत सा लड़का था
वहीँ संजू कुछ अलग तरह की ही मिटटी का बना था
वो बहुत ही वाचाल,ज़िंदगी से भरपूर,निश्चिन्त और आत्मविश्वास से भरा हुआ था
वो ऐसा था के कुछ भी हो जाए
उसको विश्वास होता था की वो इसे अपने फायदे में मोड़ ही लेगा,
मतलब जैसे उसके साथ तो कुछ गलत कभी हो ही नहीं सकता
जैसे समर वेकेशन होमवर्क ना करना और फिर भी सजा से बच जाना,
किसी शरारत में पकडे जाने पे भी
कैसे न कैसे बच निकलना उसके लिए बाएं हाथ का खेल था
देसी भाषा में बोलू तो बहुत बड़ा जुगाड़ू था संजू :)
संजू हमेशा अपनी उम्र से बहुत ज्यादा आगे की समझ रखता था
यहीं मनु शायद अपनी उम्र से कुछ कम की :)
मतलब दोनों का स्वाभाव एकदम उलट था
(पर शायद दोस्ती होती भी कुछ अलग-अलग टाइप के लोगों में ही है)
उस जिंदगी की मूवी में संजू हीरो था और मनु साइड हीरो
(वो होता है ना हर मूवी में हीरो का एक घोंचू दोस्त :) मनु वही था )

संजू जब 9 वी क्लास में था
वो स्कूल की छुट्टी के बाद दूसरे सेक्शन की लड़की के पीछे जाकर,
रोज़ उसे घर तक छोड़ के आता था
(वैसे मनु भी इच्छा से या अनिच्छा से अक्सर साथ ही होता था)
संजू दावा करता की वो लड़की संजू की GF यानिकि GIRL FRIEND है
(हालांकि उन दोनों को बात करते किसी ने कभी नहीं देखा था )
स्कूल में किसी लड़की को साइड से टकरा कर निकल जाना
कहीं छू लेना और फिर सब दोस्तों को हँस कर बड़ा-चढ़ा के बताना
संजू के लिए आम सी बात थी
संजू का कहना था की उसकी एक गर्ल फ्रेंड उसके पड़ोस में भी है
और एक बार तो जब संजू 7 दिन की छुट्टी के बाद अपने कजिन भाई की शादी से लौटा तो
संजू ने बताया की कैसे शादी में संजू की नयी भाभी की छोटी बहन
संजू की दीवानी हो गयी थी और
उसने खुद आगे बढ़कर संजू को किस किया
और फिर उन दोनों ने .....ना जाने क्या क्या :)
संजू, मनु का आदर्श बन गया था
अच्छा बुरा तो पता नहीं पर मनु को लगता था की संजू उससे कहीं बहुत आगे है
उसे जीवन का सब कुछ पता है और मनु को कुछ भी नहीं पता
मनु ,संजू के जैसा बनना चाहता था
बिंदास जीना चाहता था

ये स्कूल 10TH तक ही था तो 10 TH  के बाद दोनों का अलग-अलग स्कूल मे दाखिला हो गया
संजू रामजस स्कूल,आनंद परबत चला गया
मनु को पापा ने अपने एक बोहोत ही ख़ास मित्र की मदद से ,
सिविल लाइन्स के बहुत प्रेस्टीजियस स्कूल लुडलो  कैसल में दाखिल करा दिया था
मनु अलग स्कूल में जाने लगा पर उसे संजू के साथ की ऐसी आदत पड़ गयी थी की
नए स्कूल में उसका मन ही नहीं लगता था
वो बहुत रोया धोया
पापा बहुत गुस्सा हुए
पर कुछ ही दिन बाद मनु ने लुडलो कैसल स्कूल छोड़ दिया
और संजू के स्कूल में ही आ गया
(ये स्कूल बहुत ही घटिया था और इसने मनु के जीवन को कैसे बदला ये फिर किसी कहानी में )
अब दोनों दोस्त फिर साथ थे
ये स्कूल पिछले स्कूल से एकदम अलग था
जहाँ पिछले स्कूल में सख्त अनुशासन था इस स्कूल में बिलकुल रोकटोक नहीं थी
तो दोनों का स्कूल बंक करना ,  मॉर्निंग शो देखना अक्सर होता था
11 TH ,12TH  २ साल वो साथ उस स्कूल में रहे
वहां और दोस्त भी बने पर वो दो, एक ही रहे
स्कूल ख़त्म हो गया था
12 TH में मनु के नंबर बहुत कम आये थे और संजू तो बस फ़ैल होते-होते बचा था
मनु बहुत निराश था,वो संजू से बोला - "भाई अब क्या होगा ?
संजू (हँसते हुये बोलै था  )-
"अबे पास तो हो गए ना "
"और क्या चाहिए भाई जीने के लिए
सब कुछ तो है :) "

संजू ने इसी मोड़ पे पढ़ाई छोड़ दी और अपने पापा की दूकान जाने लगा
मनु ने कॉलेज में एडमिशन ले लिया
शुरू शुरू में दोनों मिलते थे
पर समय के साथ ये अंतराल बढ़ता गया
मनु के जीवन में अब नए-नए दोस्त आ रहे थे
अब उलटा हो गया था
कहाँ मनु संजू के बिना रह नहीं पाता था और कहाँ अब
संजू फोन करता था पर मनु के पास उससे मिलने का ,बात तक करने का समय नहीं होता था
मनु ने फोन उठाना भी बंद कर दिया था
फिर शायद संजू भी समझ गया और अब उसके फोन भी नहीं आते थे

बरसों बाद संजू का अचानक फोन आया
उसने मनु को बताया की वो सोनीपत शिफ्ट हो गया है
"कभी मिलने आजा ना "(संजू हंसकर बोला था )
शायद बरसों का जमा हुआ अपराधबोध था या क्या पता नहीं पर
अगले संडे ही मनु ,संजू के घर सोनीपत में था
वो एक साफ़-सुथरा, बड़ा, खुला ,हवादार सिंगल स्टोरी बंगलो टाइप सिंपल घर था
अकेले बैठे तो संजू ने बताया -
"भाई करीब 10 साल पहले ही पापा की मौत हो गयी थी
तुझे फोन किया था पर तूने उठाया ही नहीं तो..
(मनु ने शर्म से आँखें झुका ली थी )
पापा का कुछ पुराना क़र्ज़ था (वो बहुत धीमे स्वर में बोल रहा था)
तो त्रिनगर वाला घर बेचना पड़ा
क़र्ज़ चुकाने के बाद बचे पैसे में दिल्ली में कोई घर मिला नहीं
तो सोनीपत की इस नयी बसी सुनसान सी हुडा कॉलोनी में ये 500 गज़ का प्लाट ले लिया था
फिर धीरे-धीरे बना भी लिया
भाई पहले-पहले बहुत रोना आता था यहाँ आकर (उसका स्वर रुआंसा सा था )
बहुत तकलीफें थी यहाँ रहने में
सुनसान था बिलकुल
ना कोई आस-पड़ोस में रहता था
ना कोई सामान पास में मिलता था
सब रिश्तेदार दिल्ली में थे तो कोई इतना दूर मिलने भी नहीं आ पाता था
यार तब यहाँ आने-जाने का भी कोई ख़ास साधन नहीं था
मम्मी पूरा-पूरा दिन रोती थी की
 "तू मुझे कहाँ जंगल में ले आया "
"पर भाई अब यहाँ सब बेहतरीन है (वो हॅसते हुए बोला )
अब सब सुविधाएँ यहाँ आ गयी हैं
यहां सब लोग घर के पीछे के हिस्से में खुद सब्जियां उगाते हैं ,तो हम भी उगाने लगे
पास में ही सारी जरूरतों की दुकाने अब खुल गयी है
सारा पास-पड़ोस भर गया है
अब मम्मी का पड़ोस के लोगों में खूब दिल लग गया है
रिश्तेदार भी कभी-कभी मिलने आ ही जाते है
"जैसे आज तू भी आ गया", (संजू ने खिलखिलाते हुए कहा)
(मनु थोड़ा शर्मिन्दा,असहज हो गया था )
मनु- "भाई तू दूकान कैसे जाता है "
संजू- "स्कूटर से सोनीपत रेलवे स्टेशन जाता हूँ और वहां से सीधी ट्रैन है नए बाज़ार दूकान की
शाम को 7 वाली ट्रैन से घर वापस "
फिर आराम मारो
"और क्या चाहिए भाई जीने के लिए
सब कुछ तो है :) "

अब फिर संजू और मनु को मिले बरसों हो गए थे
अचानक ही COVID-19 की वजह से पूरे भारत में LOCKDOWN  हो गया
LOCKDOWN के कुछ ही दिन बीतें होंगे की संजू ने फिर मनु को फोन किया
आमतौर पे मनु अब भी संजू का फोन नहीं उठता था पर
इन दिनों अपने व्यस्त जीवन से बिलकुल खाली, बोर था
फोन उठाते ही संजू की वही चहकती आवाज़-
"साले आज फोन उठा ही लिया तूने भाई का
और घर-परिवार कुशल-मंगल ?
मनु सकुचा गया-"हाँ भाई सब बढ़िया, तू बता  "
मनु का इतना बोलना था की ....
संजू- "भाई अपना तो भयंकर अच्छे वाला टाइम कट रा है "
घर के सामने वाला प्लाट खाली  पड़ा था तो उसमे एक बैडमिंटन कोर्ट बना लिया है
पूरे दिन सारा मोहल्ला वहां साथ में बैडमिंटन खेलता है
कभी चाय-पकोड़े , कभी रूहअफजा और शाम को तो भाई रोज़ दारु....
और भाई वज़न भी 5 किलो घटा लिया 1 महीने में ,बस अब 2 किलो और घटाना  है
सब्जियां तो यहाँ सारे घर में ही उगाते है तो आपस में बाटर कर लेते हैं
थोड़ी दूर पे ही एक किसान अपने खेत पे भैस पालता था
पहले तो साला बहुत नखरे करता था
ज्यादा रेट माँगता था तो हम दूध नहीं लेते थे
पर साले के ग्राहक दूर थे तो
अब साला मिन्नत करके रोज़ हमारे भाव पे ,दोनों टाइम हाथ जोड़कर दूध देकर जाता है "
बढ़िया खा रहें हैं
पी रहें हैं
ज़िन्दगी मज़े से कट रही है
"और क्या चाहिए भाई जीने के लिए
सब कुछ तो है "

मनु का मुँह खुला का खुला रह गया
कहाँ वो दिल्ली शहर की एक पॉश कॉलोनी में रहते हुए
सारा दिन बस नकारात्मक बातें सोचता रहता है के
दुनिया ख़त्म हो गयी है
कुछ नहीं बचा
क्या होगा ?
कैसे होगा ?
और ये संजू.....
इतना सकारात्मक....
इतना खुश कैसे ....
उसके कानों में बार-बार बस संजू के शब्द गूँज रहे थे

"और क्या चाहिए भाई जीने के लिए
सब कुछ तो है "

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#बचपन #bachpan
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सूरज को सर पे उठाये फिरती हूँ

चन्दा का हाथ पकड़
सूरज को सर पे उठाये फिरती हूँ
पेट में आधी रोटी है पर खुश हूँ
स्वाभिमान दिल में जगाये फिरती हूँ

Monday, May 11, 2020

"सर" मूवी की पूजा भट्ट

ये कहानी मनु नाम के एक लड़के की है
( मनु की कहानी का "सर" मूवी और पूजा भट्ट से क्या रिश्ता है ये आपको कहानी के दौरान ही पता चलेगा:)
थोड़ा सस्पेंस भी तो रहना चाहिए ना :)

मनु बचपन से ही एक हकलाने वाला बच्चा था
ये कब शुरू हुआ
कैसे शुरू हुआ
इसका कोई पक्का पक्का पता तो नहीं है फिर भी...
मनु जब बच्चा था तो गलती से अपने पापा के कुछ बेहद जरूरी पेपर शायद फाड़ दिए
पापा एक मेहनतकश इंसान थे
शायद उनके लिए उन पेपर का फटना बहुत बड़े पैसों का नुक्सान रहा होगा
खुद को रोक ना सके और मनु को एक थप्पड़ ...
शायद तभी से ये हकलाना......

सबसे पहला वाक्या जो मनु को अपने हकलाने का याद है वो बहुत बचपन के समय का है
वो शायद 6-7 साल का रहा होगा
माँ ने पास की दूकान से कुछ सामान लेने भेजा था
वो चुपचाप दूकान से थोड़ा सा दूर ही खड़ा हो गया था
ताकि दूकान पे तब जाये जब और कोई ग्राहक वहाँ ना हो
कोई उसे हकलाते ना सुन सके
सबके जाने के बाद वो गया और 5 का नोट दिया ,बोला - "ची -ची -ची -चीनी....
दुकानवाले के चेहरे पे हँसी थी ,उसने ठीक से सुन लिया था फिर भी बोला-
" फिर से बोल "
मनु- "ची -ची -ची -चीनी  दे दो "
उसने पहले से भी ज्यादा हकलाते हुए बोला था
निगाहें नीचे थी
स्वर रुआंसा
और आँखों में पानी...

ऐसे अपमान के मौके मनु के जीवन में बार-बार आते रहे
अनजान लोग ही नहीं ,बल्कि जाने-अनजाने में कभी-कभी दोस्त,रिश्तेदार भी...
कोई भी अछूता नहीं था
जिसको जहा मौक़ा मिलता उसका मज़ाक उड़ाया जाता
उसके लिए अनजान लोगों से बात करना सबसे ज्यादा मुश्किल था
और फोन पर किसी से बात करना ,रास्ता पूछना तो बहुत बहुत मुश्किल
(क्या करें तब गूगल भी नहीं था ना :) )
स्कूल में मेधावी होने के बावजूद क्लास में सबसे पीछे बैठना
ताकि टीचर से छुप सके
कहीं टीचर मनु से कोई सवाल न पूछ ले
और अगर कहीं पूछ लिया तो मनु चुप रहता  ,
जैसे कुछ आता ही ना हो
हालांकि जवाब उसे सारे आते थे :)
सारी टीचर रिजल्ट देखकर हमेशा हैरान होती -
"ये मनु इतने अच्छे नंबर लाता कैसे है ?
क्लास में तो कुछ बोलता नहीं
शायद नक़ल करता होगा :)"

टीचर उसे चाहे जो समझे पर मनु एक शार्प बच्चा था
हर साल फाइनल एग्जाम होते ही ,रिजल्ट आने से पहले ही अगली क्लास की बुक्स वो ले आता था
और कई चैप्टर स्कूल में नयी क्लासेज शुरू होने से पहले ही वो पढ़ चुका होता था
पढ़ाई तो बढ़िया हो रही थी पर स्कूल में स्टेज पे वो कभी नहीं गया :)
जो बच्चा साधारण बातचीत में हकलाता हो वो स्टेज पे स्पीच कैसे..
ये उसकी चाय का कप नहीं था , I MEANT ,THIS WAS NOT HIS CUP OF TEA :)

हर व्यक्ति उसे ठीक होने की नयी-नयी तरकीबें बताता था
"कबूतर का झूठा पानी पियो"
"गरम पानी से गरारे करो"
"ठंडी चीज़ें खाना/पीना छोड़ दो"
मनु ने घर में सबसे छुप के पूना से वीपीपी से एक ऑडियो कोर्स भी मंगाया
जो दावा करता था की ये कोर्स उसका हकलाना ठीक कर देगा
उस भले जमाने में वो 500 रुपए का कोर्स था
(मनु ने इसमें अपनी कई महीने की जमा जेबखर्ची लगा दी थी )
मगर सब बेकार
पापा ने एक बार हॉस्पिटल में दिखाया था तो डॉक्टर ने  -
 - "गले में टॉन्सिल है"  कहकर आपरेशन कर दिया :)
पर मनु को इसमें बहुत मज़ा आया
क्यूकि ओपरेशन के बाद उसे भर-भर के आइस क्रीम और कोल्ड ड्रिंक खाने-पीने मिलीं:)
(टॉन्सिल के ओप्रशन में गले में कुछ सर्जरी होती है तो कुछ दिन केवल ठंडी चीज़े ही खानी-पीनी होती हैं)

ऐसे ही दिन-महीने-साल बीतते रहे
1993 में जब "सर" मूवी आयी तब मनु 20 साल का था, कॉलेज में पढ़ रहा था
(उस समय भी वो सबसे झूठ बोलकर स्पीच थेरेपी की क्लास लेने डॉक्टर सुजाथा के पास जाया करता था
वो अपने दोस्तों को भी नहीं बताता था की कहाँ जा रहा है
हालाँकि मनु को कोई फायदा होता नहीं दिख रहा था  )

एक बार सब दोस्तों का प्रोग्राम बना था "सर" मूवी देखने का
उस मूवी में पूजा भट्ट ने एक ऐसी लड़की का किरदाई निभाया था- "जो हकलाती थी"
फिल्म देखने के समय और बाहर आने के बाद दोस्त खूब हसें थे
एक दोस्त डिम्पल (लड़का था :) ) ने कहा -

"मनु तू तो यार बिलकुल सर मूवी की पूजा भट्ट है :) "

बाद में भी डिम्पल जब भी मिलता था ,हमेशा ऐसे ही कहता था
बड़ी अजीब सी फीलिंग थी ये मनु के लिए
कैसी थी ये बयान करना मुश्किल है
बस समझिये एक अंधा कुआँ था और दूर-दूर तक रोशनी कहीं दिखती ही ना थी

बहुत बाद में करीब 27 साल की उम्र में शायद किसी न्यूज़पेपर में या याद नहीं कहाँ से
उसे एक PERSONALITY DEVELOPMENT कोर्स का पता चला
तब जाके जीवन में पहली बार उसने जाना के
ये समस्या शरीर की नहीं बल्कि मन के आत्मविश्वास से जुडी है
उस कोर्स में वो सब कुछ होता था जो आत्मविश्वास बढ़ाता था
"स्पीच,
मिरर स्पीच,
स्टेज स्पीच,
एक्टिंग,
प्रोत्साहन,गलती पर भी शाबासी"

वहां वो सब कुछ होता था जो ,अगर अंदर मन में कुछ टूटा हो तो उसको जोड़ देता है
वहां मनु ने 20 लोगों की क्लास के सामने बोलने से शुरू किया
हर दिन के साथ चीज़े आसान होती गयीं
आत्मविश्वास बढ़ता गया
अवसाद के बादल छटने लगे
और लगभग 2 साल बाद मनु 1000 लोगों की सभा में भी बोला और
अच्छा बोला
शायद वो वहाँ धाराप्रवाह ना बोला हो
शायद बीच में कहीं हकलाया भी हो
पर ये महत्वहीन हो गया था उसके लिए तब
तब वो ये समझ चुका था की

" क्या बोला जा रहा है वो महत्वपूर्ण है
   कैसे...  कितना धाराप्रवाह...
   ये इतना कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता "

ये समझ आते ही कुछ बहुत मन का टूटा हुआ जुड़ गया था
उसके मन के अंदर :)
अब ये समस्या उसके साथ है भी या नहीं भी है
पर हाँ उसके लिए दुःख का कारण नहीं थी :)
वो अँधेरे कुँए से बाहर निकल आया था ,और बहुत खुश था :)

अब मनु घर में ,
परिवार में,
दोस्तों में
कहीं भी किसी बच्चे को बोलने में हिचकते देखता
तो बस जुट जाता था उसका आत्मविश्वास बढ़ाने में

बच्चो के अपने बहुत छोटे-छोटे डर, परेशानियां होती हैं
हकलाना, तुतलाना, बिस्तर में पेशाब करना ...इत्यादि
उन्हें बस बहुत सा प्यार, थोड़ा सा समय, अपनापन ,प्रोत्साहन चाहिए होता है

मनु का सोचना है की और अब कोई बच्चा इस भंवर में नहीं घिरना चाहिए
उसे मालून है ये कैसा अंधा कुआँ है
जितना इसमें गिरते जाते है ,अँधेरा बढ़ता जाता है
रोशनी दूर और दूर होती जाती है

सुनहरी सुबह पर हर बच्चे का सामान हक़ है और ये उसे मिलना ही चाहिए
नटशेल में बात ये है की अब कोई भी और बच्चा
कभी "सर" मूवी की पूजा भट्ट नहीं बनना चाहिए :))

(वैसे अब आपको बता ही दूँ की ये मनु कोई और नहीं आपका अपना नाचीज़ दोस्त यानि की मैं खुद हूँ :) )

#बचपन #BACHPAN 
manojgupta0707.blogspot.com







Sunday, May 10, 2020

शराफत वाला बैट

मेरा जन्म 1973 त्रिनगर का है
तब त्रिनगर एक कच्ची कॉलोनी हुआ करता था
( कमाल ये है की 47 साल बाद भी कच्ची कॉलोनी टर्म दिल्ली में आज भी है  :)
क्या करें ,
DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण) को जो काम दिया गया था
NO प्रॉफिट NO लॉस पालिसी से लोगों को रियायती दर पर दिल्ली में अपना घर उपलब्ध कराना
DDA पता नहीं क्यों पर अपने कार्य में करीब करीब फेल रही है।

तो इसी बात का लाभ उठाकर दिल्ली के बड़े जमींदारों ,लोकल राजनेताओं और प्रॉपर्टी डीलर्स ने दिल्ली में खेती की जमीन पे ही हज़ारों कच्ची कॉलोनियाँ बसा दीं थीं
उस समय उन  कॉलोनियों में
ना बिजली
ना साफ़ पानी
ना सीवर
ना पार्क
गलियों छोटी-छोटी
और नाही कोई अन्य सामुदायिक सुविधा
बस जमीन का एक टुकड़ा भर जिस पर सर छुपाने के लिए 4 दीवारें और एक छत बनाई जा सके
( और तो और इस घर को भी तोड़ने समय-समय पर DDA /सरकारी लोग आते रहते थे/हैं  )

कॉलोनियों के नाम ऐसे रखे जाते थे जैसे
राम गुर्जर के खेत पे बनीं कॉलोनी राम नगर और कन्हैया गुर्जर के खेत पे बनी तो कन्हैया नगर
ऐसे ही विश्राम नगर, श्याम नगर,देवाराम पार्क आदि आदि
कहते है शुरू में यहाँ तीन बड़ी कॉलोनी (कन्हैया नगर,विश्राम नगर और देवाराम पार्क ) थी तो जब सरकार ने इस जगह पे बस सेवा देने की सोची तो इस पूरे इलाके को मिलाकर एक ही नाम दे दिया  "त्रिनगर"

त्रिनगर तब ऐसे गरीब प्रवासी लोगों की रिहाइश बना जो बेहतर जीवन की तलाश में
ज्यादातर हरियाणा और उत्तरप्रदेश के गावों/छोटे शहरों से यहाँ आये थे
इन सब लोगों के पास पैसे बहुत कम थे तो सर पे छत जैसी मिली वैसी सही
(पता नहीं क्यूँ पर ज्यादातर लोगो ने यहाँ आकर
प्लास्टिक चप्पल या प्लास्टिक दाना बनाने का काम ही शुरू किया)

त्रिनगर बसने के बाद इस पूरे इलाके में अब दो तरह के परिवार हो गए थे

१- जमींदार परिवार -
जो अधिकतर बड़े-बड़े घरों में रहते थे
पैसा बहुत था, जो उन्होंने अपनी खेती की जमीन पर कच्ची कॉलोनी बसाकर कमाया था
इसके अलावा वो लोग मूलतः फ़ैक्टरियो को अपनी जगह किराए पे देकर भी मासिक मोटा पैसा कमाते थे
इनमें अधिकतर पुरूषों का दिन ताश खेलकर और शराब पीकर बीतता था
इस तरह के मौहोल में इन परिवारों के लड़के भी अधिकतर दबंग हो रहे थे
उनका ध्यान भी पढ़ाई में कम और बदमाशी में ज्यादा था

और

दूसरे वो गरीब प्रवासी परिवार जो दूसरे प्रदेशों से यहाँ आये थे
जिनके पुरुष दिन-रात मेहनत करते थे
घर की महिलाये सारे काम खुद अपने हाथ से करतीं थीं
पुरे परिवार पर पैसा कमाने और पैसा बचाने का भारी दवाब था
और बच्चों पर पढ़-लिख कुछ बन जाने का
इनके घर बहुत छोटे होते थे जिसमे नीचे फैक्ट्री और ऊपर ही इनके पूरे परिवार की रिहाइश होती थी


इन दोनों तरह के परिवारों के बच्चों का आपस में बस एक ही जगह आमना-सामना होता था
और वो थी क्रिकेट खेलने की जगह
जैसे रोज़ गार्डन, सेंट्रल स्कूल प्ले ग्राउंड या फिर बी-3 लारेन्स रोड ग्राउंड
और वहाँ इन गुर्जर-जाट बच्चों का एकछत्र साम्राज्य था
वो ग्राउंड में बाद में आयें या पहले ,उनके आने के बाद बस वो ही खेलेंगे
ये अलिखित नियम था
उनके आने के बाद बाकी सब बच्चे अब अपने घर जाओ
गन्दी गालियाँ देना, किसी को भी मार-पीट  देना ,
दूसरे बच्चों से पैसे / सामान छीन लेना ,इनके लिए आम सी बात थी
इससे बाकी बच्चों का मन बहुत व्यथित रहता था
पर इसका कोई हल ही ना था
हम बच्चो को हमेशा यही सिखाया जाता था -
"के बेटा झगड़ा मत करना, चुप रहना इत्यादि इत्यादि  "

एक संडे सुबह हम सेंट्रल स्कूल के ग्राउंड में क्रिकेट खेल रहे थे के ये गुर्जर-जाट बच्चे आ गए
हम क्या करते अपना खेल बंद करके जाने लगे
उन्होंने कहा-
 "चलो एक मैच रख लेते हैं ,तुम्हारी टीम और हमारी टीम में "

हम खुश ,के चलो कम से कम खेलने को तो मिलेगा
पहले हमारी बैटिंग थी ,हमने अच्छे रन बनायें
उनकी दूसरी पारी शुरू हुयी तो उनके बैट्समैन जल्दी-जल्दी आउट होने लगे

(एक और दिक्कत ये थी की उनको आउट भी 2 - 3 बार करना पड़ता था
क्युकी वो अंपायर हमेशा अपना रखते थे और फुल बेईमानी करते थे
तो वो बस क्लीन बोल्ड ही आउट होते थे
रन-आउट ,स्टंप्ड या एलबीडबल्यू  तो वो कभी आउट होते ही नहीं थे :)

हार सामने देख वो गुर्जर-जाट बच्चे तो बहुत गुस्सा हो गए
गालियाँ देने लगे
खेल बंद कर दिया
और तो और हमारा एक नया बैट भी हमसे छीन लिया
और हमें गालियां देकर भगा दिया

वो बैट मेरा था
मुझे अपनी कमज़ोरी पर बहुत धिक्कार आ रही थी
ऐसा नहीं था की पापा मुझे फिर से बैट खरीदने के लिए पैसे नहीं देते
लेकिन अगर आपकी कोई चीज़ कोई आपसे जबर छीन लें
और आप कुछ ना कर पायें
तो ये भावना ही बहुत मन तोड़ने वाली है
आत्मविश्वास ख़त्म हो जाता है
बहुत बेचारगी थी
हम उन लोगों से लड़ भी नहीं सकते थे
मुझे आज भी याद है की उस दिन शाम को मेरे दोस्त भारत के घर मैंने "शराफत" मूवी देखी  थी
और उसके गाने की लाइन मैं भी मन में दोहरा रहा था की "शराफत छोड़ दी मैंने" :)
मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे
के मैं बड़ा होकर आईपीएस बनूंगा :)
तो ये करूंगा वो करूंगा
इन लोगों से बदला लूंगा
फिर कोई मेरे साथ ऐसा कभी नहीं कर पायेगा
और ना जाने कितनी तरह की बातें :)

" ये चिंगारी मन में जली तो थी पर उस तरह से नहीं जली जैसे-

जब गाँधी जी को साउथ अफ्रीका में 
"काला हिंदुस्तानी" 
कह कर फर्स्ट क्लास की डब्बे से बाहर फेंका गया था 
तो उनके मन में जली थी
तब गाँधी जी ने भारत से ही नहीं बल्कि पूरे विश्व से ही औपनिवेशिक शक्तियों को उखाड़ फेंकने का मात्र पूरे विश्व को दे दिया था 
या फिर
तुलसीदास जी के मन में जली ,जब किसी ने उन्हें 
"बीवी के मोह में पड़ा नाकारा व्यक्ति" 
कहा तो "रामचरितमानस" लिखकर वो महृषि तुलसीदास बन गए "

काश मेरे अंदर भी वो आग उस तीव्रता से जलती रहती तो
आज आपका भाई भी कोई आईएएस /आईपीएस अफसर होता :)

ये तो हुयी मज़ाक की बात
पर सच तो ये है की आज भी इस तरह में वाक्यात हमारे जीवन में लगातार हो रहें हैं

"हमारे बैट आज भी छिन रहे हैं"

जहाँ कोई जालसाज़ व्यक्ति/कम्पनियाँ  हमारे पैसे मार रहीं है
साइबर फ्रॉड हो रहे हैं
हमारे अपने हमें धोखा दे रहा है
और हम लाचार हैं
हमारे देश में सिस्टम इतना धीमा,कमज़ोर है की

" बरसों बाद जब न्याय मिलता भी है तो वो अन्याय ही हो जाता है "

तो क्या करें
बहुत सोचा तो मुझे तो बस इतना ही समझ आया की हे प्रभु

"मुझे शक्ति देना की मैं अपने और अपनों के साथ हुए बुरे को बदल कर फिर सही कर सकूँ
और धैर्य देना के मैं सहन कर पाऊँ ,जिसे मैं ना बदल सकूँ
और इतनी समझ भी देना की 
मैं फ़र्क़ कर पाऊं के मैं क्या बदल सकता हूँ और क्या नहीं "

और क्या रास्ता है
धैर्य तो करना ही पडेगा
क्युकी अगर कुत्ता आपको काट के भाग गया तो
आप तो उसे काटने के लिए उसके पीछे भाग नहीं सकते ना :)

तो दोस्तों जीवन में सतर्क पर मस्त रहिये
स्वस्थ रहिये

"और अपने "शराफत वाले बैट" को संभाल कर रखिये , 
  खुद बचिए और अपनों को भी बचाइए "

कृपया अपनी प्रार्थना में मुझे भी याद रखिये
मुझे बहुत जरुरत है :)

#bachpan ,#बचपन , manojgupta0707.blogspot.com
Writer- Manoj Gupta


Thursday, May 7, 2020

रज्जन का सपना

रज्जन का सपना 
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रज्जन,
पराधीन भारत में उत्तरप्रदेश राज्य के एक बहुत छोटे से ,पिछड़े हुए गांव जहांगीरपुर में 1942 में पैदा हुआ
घर में दादा-दादी, माँ-बाप के साथ 5 और भाई-बहन थे 
मतलब कम से कम 10 खाने वाले पेट 
और कमाने वाले केवल २ हाथ ,उसके लाला यानि पिताजी के

रज्जन के लाला कभी बड़े जमींदार हुआ करते थे 
( जैसा रज्जन ने मुझे बताया था , अपने वक़्त में वो 60s की हिंदी फिल्मों में दिखने वाले, घोड़ी दौड़ाते हुए ,हाथ में चाबुक रखने वाले जमींदार थे :) 
पर वक़्त की मार थी-
आज़ादी के बाद जमींदारी उन्मूलन हुआ
और उनकी सारी जमीन छिन गयी, काश्तकारों की हो गयी
सरकारी आदेश था की जो जिस जमीन को बोता है ,मतलब खेती करता है ,वो जमीन उसी की हुयी
अब कौन जमींदार खुद खेती करते थे
तो सारी जमीन काश्तकारों (भूमिहीन मज़दूर किसानों  ) की हो गयी 
और जो थोड़ी बहुत बची वो भी मुकदमों की भेंट चढ़ रही थी 
{ क्योकि रज्जन के लाला ने सरकारी आदेश के खिलाफ बहुत सारे कोर्ट केस कर दिए थे }
तो अब लालाजी का सारा वक़्त उन कोर्ट केसो को जीतने की तैयारी और कोर्ट आने-जाने में बीतने लगा 
रज्जन ये सब देखते हुए बड़ा हो रहा था
रूपये-पैसे की बहुधा तंगी थी 
रज्जन देख रहा था की उसके लाला की लाचारी ऐसी ,की चूँकि जमींदार हैं (या कहें थे ) ,तो आज चाहे नाम भर के ही जमींदार हों ,
तो किसी के सामने लाचार भी दिख भी नहीं सकते , रोना तो कोसों दूर की बात
और किसी से सहायता मांगने से बेहतर तो मर जाना अच्छा समझते थे उसके लाला 
तो रज्जन बचपन से ही अपने पिता की ये लाचारी और आत्म-स्वाभिमान देखते हुए बड़ा हुआ 
खुद पढ़ा ,साथ में पिता की छोटी सी दूकान भी चलाई 
10 वीं कक्षा का छात्र रज्जन अकेले दिल्ली जाता था ,अपनी दुकान के लिए माल खरीदने 

एक दिन रज्जन ने किसी को लाला जी की पीठ पीछे कहते सुन लिया-  "लाला तुमाई जमींदारी चलो गयी पर बल अभो ना गयो ,बा बी चलो जायगो " 

रज्जन के बाल दिल में ये बात खंजर की तरह चुभ गयी 

अब रज्जन का बस एक ही सपना था
"मेरे लाला जमींदार थे और मुझे अपने लाला को फिर से जमींदार बनाना है "  

समय बीता जा रहा था 
अपने सपने के पीछे रज्जन कोलकाता, दिल्ली, पंजाब  जाने कहाँ कहाँ नहीं गया 
[पर सफलता पर अभी भी कोसों दूर ही थी 
आखिरकार 1973 में रज्जन दिल्ली गया 
(अपनी अम्माँ और पत्नी के गहने गिरवी रखकर दिल्ली गया था वो )
अपना छोटा सा कारखाना लगाया
आखिरकार इस बार ईश्वर ने उसका साथ दिया 
कुछ अच्छा होने लगा 
हालांकि उसका रहने का कमरा भी किराये का था और कारखाने वाली जगह भी
पर सालोँ बाद ज्यूही उसने पहली बार अच्छे पैसे कमाए ,
ना खुद के लिए घर खरीदा
ना कारखाने की जगह
और ना और कोई अपनी सुख-सुविधा का सामान 

उसने खरीदा अपने लाला के नाम एक बड़ा सा खेत ,अपने गांव में ही 

रज्जन को अपना सपना आज भी याद था 

"मेरे लाला जमींदार थे और मुझे अपने लाला को फिर से जमींदार बनाना है"

और उसने अपना सपना पूरा किया था
अब रज्जन के लाला फिर से जमींदार बन गए थे  

(ये कहानी लिखते हुए लगातार मेरी आँखों में आंसू बह रहे है और शरीर का हर रोंगटा खड़ा है 
आंसू यकीनन ख़ुशी के हैं  :)) 

बच्चों का मन भगवान् की तरह निर्मल होता है 
वो कुछ सोचता है तो उसमे फायदा,नुकसान नहीं सोचता
पवित्र संकल्प होता है वो
जैसे जैसे हम बड़े हो जाते हैं तो
मोह,माया, अवसर, दुनियादारी....और जाने क्या क्या अला-बला हमें दूषित कर देती है

आप भी सोचिये अगर आपने कभी कोई ऐसा सपना देखा था
जो आपके किसी अपने के लिए बहुत अहमियत रखता था 

और अब समय की गति में बहकर कहीं आप उसे भूल तो नहीं गए ?
अभी भी समय है 
वरना एक दिन समय हाथ से निकल जाएगा
तब सिर्फ आत्मग्लानि और पश्चात्ताप। 
  
(रज्जन का पूरा जीवन ही पढ़ने योग्य है, चाहे तो मेरे blog 
manojgupta0707.blogspot.com 
 पर आकर कहानी " प्रवासी-1 से प्रवासी-13 " में पढ़ सकते हैं. }